Friday, June 20, 2014

स्त्री: उसका शोषण, उसकी सोच और एक परिवर्तन...


जैसे जैसे भारतीय समाज में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं, वैसे वैसे लोग मर्द जाति को ज्यादा कोसने लगे हैं... और हर पल लेख आ रहे हैं कि मर्द को क्या करना चाहिए और क्या नहीं... भारतीय समाज को पुरुष प्रधान समाज बता कर चिल्लाये जा रहे हैं... लेकिन सोचने का विषय है कि क्या वाकई में समाज केवल पुरुष से बनता है? क्या वाकई में सारी गलतियाँ पुरुष ही करता है? सच ये है कि स्त्री भी सहभागी है... और उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, ये कोई नहीं बता रहा है... तुच्छ मानसिकता वस्तुतः केवल पुरुष से नहीं निकलती यद्दपि स्त्री का भी साथ होता है उसमें... अगर स्त्री गलत नहीं सोच रही है, लेकिन गलत के खिलाफ आवाज़ नहीं उठा रही है तो वह भी गलत का हिस्सा हुई... ऐसी ही कुछ बातों से विचलित होकर मैंने ये लेख लिखा है... स्त्री की सोच और उसके उत्थान के लिए एक पहल:
·         हम तो औरत जात हैं, घर में ही ठीक हैं – अर्धांगिनी का मतलब होता है कि आपको अपने पति का हर कदम साथ निभाने के काबिल होना चाहिए... औरत होने से पहले मनुष्य जात से सम्बन्ध रखती हैं आप..
·         भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए हमें ढके हुए कपड़े पहनने चाहिए – संस्कृति कपड़ों से नहीं बल्कि सोच से बचायी जाती है... स्त्री कलात्मकता का स्वरुप है, उसे ढक कर आप पुरुष को और विचलित बना रही है... और दिखावे की समझ भी जरुरी है... फूहड़ दिखावा, संस्कृति को बिगाड़ता है, जबकि कलात्मक दिखावा उसका विकास करता है... दिखावे के लिए अंग-प्रदर्शन हो यह जरुरी नहीं, लेकिन आपका साथी क्या चाहता है और आप उसे किस कला से प्रदर्शित करती हैं ये समझ होनी जरुरी है...
·         हमें केवल आसान विषय समझ आते हैं, विज्ञान, गणित ये सब पुरुष वर्ग के लिये हैं – विषयों की समझ का सम्बन्ध उसके दिमाग की क्षमता से है, न कि किसी के स्त्री या पुरुष होने से... असल बात ये है कि आप अपनी तुच्छ सोच के आवरण से बाहर नहीं निकलना चाहती...
·         लेकिन रूढ़िवादी लोग हमें जीने नहीं देंगे – जीवन जीना एक कला है... और जो मानसिकता किसी भी कला का दमन करती है, उसकी उपेक्षा करना बेहतर ही है... समय पर हो जाये तो ठीक है, अन्यथा क्रांति आती है... रुढिवादिता ठीक है अगर सत्य पर आधारित है और किसी के मौलिक अधिकार का हनन नहीं करती... लेकिन व्यक्ति के विकास को रोकने वाली सोच से लड़ने में कोई बुराई नहीं है बल्कि स्वतंत्रता का प्रतीक है...
·         हम भारतीय नारी, हमें पतिव्रता होना चाहिए और जैसा पति कहे वैसा करना चाहिए... तलाक एक कलंक है... – सबसे पहली बात पति परमेश्वर नहीं है... परमेश्वर वो है जो सच है और जो किसी का भी तिरस्कार नहीं करता... आपका पति एक साधारण मनुष्य है और अगर वो गलत है और आपके अस्तित्व का अपमान कर रहा है, तो उसे त्याग देना बेहतर है... तलाक कोई कलंक नहीं बल्कि आपके स्वाभिमान का रक्षक है..
·         मुझे क़ानून की बातें समझ नहीं आती- यह आपकी गलती है, हर व्यक्ति को अपने मौलिक अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए... आजकल बहुत से संसथान हैं जो आपकी मदद करेंगे, उसके लिए आपको बहुत सी चीज़ों को व्यवस्थित करना होगा... उन चीजों में से सबसे पहले है आपकी खुद की सोच.. उसे मौलिक और स्वतंत्र बनाईये...
·         लड़का- लड़की के शरीर और इच्छाओं में अंतर होता है, हम अपने बेटे को किसी बात के लिए नहीं रोकेंगे, कल को वो ही हमें रोटी खिलाएगा बुढ़ापे में – शरीर और इच्छाओं में अंतर होने से कोई मतलब नहीं है, सबसे पहली बात है की उनमें कितनी मनुष्यता या विभीत्सिता है... अगर आप अपने बेटे के गलत कार्यों में सहयोग कर रही हैं तो आप उसे अमानवीय और दुष्ट हृदय का बना रही हैं... बुढ़ापे में सहारा एक दयावान और सात्विक मनुष्य बन सकता है, भले ही वह बेटा हो या बेटी...
·         अब तो उम्र चली गयी है पढ़ने लिखने की, अब क्या सीखें और क्या सिखाएं – पढ़ना-लिखना केवल कॉलेज या महज किसी डिग्री तक सीमित नहीं है... जरुरी है कि आप कितनी जागरूक हैं समाज को लेकर, बदलती सोच को लेकर, या किसी भी नए परिवर्तन को लेकर... और यह भी जरुरी नहीं है कि नया है तो अच्छा ही होगा.. परखना जरुरी है... सीखना और सिखाना आपकी म्रत्युपर्यंत चलने वाला है... आपकी समझदारी है कि आप इससे बचती रहें या फिर आप इसे खुशी खुशी अपना लें...

अभी इतना ही... कुछ और बातें अटपटी लगीं तो आगे जरुर लिखूँगी.... धन्यवाद... :)

6 comments:

Dev Khandelwal said...

very intellectually phrased lines... so true..:) hatss off n sply dat talaq one.. :) keep writing

Sameer Kulkarni said...

This was some real thought provoking stuff...we gotta appreciate and embrace the differences between men and women and turn them into our strenghts...picking on them will only result in making us weak as a society...very well written!

Divya Jyoti Arya said...

Thanks to both of you for your time and reviews.. :)

Pranjali Tripathi said...

Am feeling so Inspired by reading this :)
Its human nature to Blame others rather than looking for themselves... I Wish every body could think like you !! ... People must read this ... Its a Truely Awakening Article ... Specially for yuth like us !!

Nirmal Siwach said...

मुझे ख़ुशी हुई ये जानकर की तुम्हारे जैसी युवा बेटी भी है।
जो इस गहन चिंतन के विषय को छू सकती है।
मेरा मानना है की ,महिलाओं की दुर्दशा की जिम्मेदार
वे स्वयं हैं। माता ही संतानों की निर्माता होती है।
वो जैसी चाहे संतान उत्पन्न कर सकती है। वेदों के सोलह
संस्कारों में एक संस्कार श्रेष्ठ संतान के लिए भी है। इसपर
कोई धयान नहीं देता। इस विषय में बेटियों की शिक्षा बहुत
जरुरी है।

Anonymous said...

bahot achha likha hai.. aisi hi likhti raho..

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