Thursday, January 31, 2013

रंगमंच...




कठपुतलियाँ एक रंगमंच की, कुछ इस तरह से गाने लगीं...
कि भीड़ के सन्नाटे से... कभी सिसकियों तो कभी कह्कशों कि गूँज आने लगी...
कुछ जश्न था आवाज़ में... संग मौजूद कभी दर्द था...
कभी सोचा न था पहले.. ऐसा वो अविरल दृश्य था...
किसी की ममता रो रही थी.. तो कोई प्रेम में संलग्न था...
मूक बैठे सब देख रहे थे... रास और रंग का ऐसा संगम था...
एक आती, दूसरी जाती... कभी समूह में मिलकर आवाज़ उठाती...
उसी भीड़ में बैठा एक वृद्ध... सपाट चेहरे पर एक मुस्कान थी...
न प्रशंषा में, न ही उन्माद में... अपितु एक व्यंग्य को प्रकाशती...
मैंने पूछा कि, “बाबा... क्या अर्थ छिपा है इस भाव में?”
उत्तर में – “यह जो देखती हो भावनाओं का मेल...
फूट पड़ा है जो जवां कुसुम की तरह...
कुछ ही पल में विरक्त हो जायेगा... मेरे जीवन की तरह...
दर्शकों के लिए मनोरंजन है... और निर्माता के लिए जीवनयापन...
कोई न सोचेगा इन नायक-नायिकाओं की अपेक्षाओं के बारे में...
हमारी स्वयं कि परिकल्पनायिएँ ही तो ये दर्शाती हैं...
यूँ कहो कि खुद पर ही हम हँस रहे हैं... और खुद पर ही बहा रहे हैं आँसू...
यही करना है... तो इन निर्बोध कठपुलियों का सहारा क्यूँ...?”
मैंने कहा – “अरे बाबा! यही तो रंगमंच है...”
और भीड़ की सिसकियों के बीच, दो चेहरे मुस्कुरा उठे...

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