Friday, July 13, 2012

मोक्ष-- मुक्ति-द्वार या महज एक स्वप्न..??


एक विचलित व्यक्ति को जाते देखा सड़क पर... भारत की राजधानी दिल्ली की व्यस्त सड़क पर... क्या है इसकी खोज... सबकी खोज... पूरे मानव जाति की खोज... कड़ियाँ यूँ ही जुड़ती गयी... उसके ऊपर ध्यान गया क्यूंकि मैं भी उसके जैसे थी... विचलित... सब कुछ तो था मेरे पास... फिर किस चीज़ की खोज...?? शान्ति...?? नहीं... ये नहीं... रचनात्मकता...?? नहीं... इसकी भी कोई कमी नहीं... मनोविज्ञान के इस अंतर्द्वंद में सोच ठहरी... कुछ दार्शनिक और कुछ आध्यात्मिक से विचार पर... “मोक्ष”... ये बाकी है खोजने को... नहीं... ऐसा भी नहीं है... बहुत लोग दावा करते हैं उसे भी पाने का... लेकिन सबसे कठिन है उसे पाना ऐसा कथन है... बहुत से महान लोगों को पढ़ा... तरह तरह की परिकल्पनाएं... तरह तरह के साधन... माध्यम... पथ... मैं फिर भी संतुष्ट क्यूँ नहीं हूँ...?? मैं सहमत ही नहीं हो पायी आज तक कि ऐसा कुछ विद्दमान है... धार्मिक लोग कहेंगे मुझे... सनकी... शायद... बहिष्कार भी कर दें मेरा... अपने अस्तित्व के संरक्षण के विचार ने आगे कुछ सोचने न दिया... पर जब देखा फिर से एक विचलित व्यक्ति... तो वर्षों पहले दबे सवालों ने फिर से जीवन के पहलुओं को टटोलना शुरू कर दिया... मेरा जिज्ञासु मन फिर से उत्सुक हो उठा... क्या पालथी लगाकर... आँखें मूंदकर बैठने से... “ध्यान” लगाने से... वास्तव में हो जायेगी “मोक्ष” की प्राप्ति...?? सब बातें करते हैं इसके बारे में... और मैं सोचती हूँ इसके अस्तित्व के बारे में... इसी उधेड़बुन में... कब मैं घर पहुंची पता न चला... रास्ता या तो सहयात्रियों से वार्तालाप में कटता था... या फिर मेरे स्वयं के ही वैचारिक संघर्ष में... घर पर सब वैसा ही था पहले जैसा... जीवन की रफ़्तार धीमी है... आप सोच सकते हैं गहराईयों तक... मिट्टी की सुगंध आपका मनोबल बढ़ाती है... पिताजी विद्द्यालय चले गए... माते ने अवकाश ले लिया... दोपहर में बारिश हुई तो चाय पकोड़ी का माहोल बना... और हम दोनों चले गए वास्तिविकता और कल्पनाओं के बीच झूलते कुछ सवालों के उत्तर की खोज में... क्या हैं हमारे कर्तव्य...?? क्या है जाति-बंधन...?? बहुत से प्रसंगों के बीच में से निकल आया... “मोक्ष” भी... छाछ को बिलोते रहो मक्खन निकल आता है... इसी तरह धार्मिकता को बिलोया... तो मोक्ष आ गया... बहुत बातें चलती रहीं... ऐसा है... वैसा है... पतंजलि के विचार... तो कभी ओशो की अवधारणायें.... क्या सही है क्या गलत...?? बहुत सी बातों ने मन को थोड़ी सांत्वना दी... बहुत सी बातें रहस्यमयी रहीं... और कुछ बातों पर हम दोनों ही असहमत थे... मेरी सबसे बड़ी असहमति थी मोक्ष की सत्यता पर... एक छलावा भी तो हो सकता है ये... पहले मनुष्य अनभिज्ञ था... ब्रह्मांड में स्थित दूसरे ग्रहों के बारे में... ये एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है... कोई भी व्यक्ति विश्वास कर सकता है अपनी इन्द्रियों पर... और बना सकता है कल्पनाएँ... दूसरों को दिखा सकता है स्वपन... यही तो चलता रहा है हमेशा से... बाजार में बैठे लोग यही करते रहे हैं... अपनी वस्तु को सबसे अच्छा बताते हैं... यह क्रीम लगाओ और गोरापन पाओ... यह पाउडर खाओ और तंदरुस्ती बढ़ाओ... और सबसे अद्भुत बात है की ये विधि कारगर भी हो रही है... क्यूंकि ये बनी है मनुष्य की कुंठित भावनाओं से... वह संतुष्ट नहीं है... कभी अपने रंग से... कभी अपने रूप से... और वह चाहता है स्वतंत्रता... ये एक बहुत बड़ा विषय है... सभी राजाओं ने... सभी साहूकारों ने... इस रोग को जान लिया... और अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए प्रयोग में ले आये... मानव जाति को चाहिए... स्वतंत्रता... हर कोई स्वतंत्र हो तो एकजुटता कैसे हो...?? राजा की बात कोई नहीं सुनेगा... बाजारी वस्तु कोई नहीं खरीदेगा... पूरा राज खतम हो जायेगा... सब एक समान हो जायेंगे... और सब अपनी करेंगे... इस बात से सब राजा आहत हुए... सब साहूकार भी चिंतित हुए... कैसे इन्हें जकडा जाये वापस...?? जाल बनाना कोई कठिन काम नहीं है... कठिन है उसका हल जानना... जाल बुन दिया गया... उसका मूल तंत्र था... स्वपन... कल्पनाएँ... पहले मनुष्य अकेला था तो उसे लगता था कि एक वही है जो कल्पना कर सकता है... धीरे धीरे उसने सीखा कि सब ऐसा ही सोचते हैं... यही बात राजाओं ने पकड़ ली... सारी प्रजा सोचती है... स्वतंत्रता के बारे में... कब इस राजा से मुक्ति मिले..?? अपनी गद्दी के संरक्षण में राजा ने जाल बुना... प्रजा को स्वपन दिखाने का... आप स्वतंत्र रहेंगे... अगर मुझे राजा चुनेंगे... हमारे राज्य में स्थापित होगा एक स्वतंत्र राज... और सब आ गए चपेट में... लोकतंत्र बना... सब खुश हुए... लेकिन कभी स्वतंत्र नहीं हो पाए... क्यूंकि आजतक उन सपनों में ही जी रहे हैं... और जीते रहेंगे... क्यूंकि बहुत मुश्किल है वास्तविकता को गले लगाना... सच को निगलना... लेकिन अमूल्य है ये नहीं पता... मनोबल चाहिए था इससे बाहर निकलने के लिए... उसे भी पहले ही छीन लिया राजाओं ने... धर्म बना दिए... जाति बना दी... सबको विभाजित कर दिया... एकता नहीं रही प्रजा के दिलों में... अब राजा चैन कि नींद सो सकते थे... ये हुई समाज कि बात... क्या धर्म में ऐसा नहीं हुआ...?? मैं कहती हूँ बिलकुल हुआ... सब व्याकुल हैं अंदर ही अंदर अपने अपने धर्म कि अवधारणाओं को मानकर... इसी बात को देख कर... धर्म-गुरुओं ने जन्म ले लिया... आ गए वो भी एक स्वप्न ले कर... उन लोगों के लिए जो त्रस्त थे अपने धार्मिक जीवन से... और उस स्वपन को नाम दिया... “मोक्ष”... अर्थात मुक्ति... यही तो सब चाहते हैं... बंधन में रहना तो पशु को भी स्वीकार नहीं... मजबूरी में ही रह सकता है कोई... पहले मजबूरी के बीज बो दो... फिर मुक्ति का स्वप्न दिखा दो... और तुम राज कर सकते हो सदियों तक... ये है मानसिकता... और सफल भी हुई है... क्यूंकि सब फंसते गए... स्वप्न की दुनिया में... जाल में... लेकिन सोचते रहे... यही है मुक्ति का मार्ग... कभी जान न पाए स्वयं को... किसी दूसरे मनुष्य को... सत्य को... बस फंसते चले गए... योग किया... ध्यान किया... लेकिन मन से छल और कपट न मिटा पाए... सारी उम्र राग गाते रहे “मोक्ष” का... मेरी विचारधारा मेरी कहानी पर खत्म हुई... मैं नहीं कहती कोई इस पर विश्वास करे... लेकिन मुझे संदेह है... और यह संदेह है तार्किक... संत कहते रहे... कि तर्क से मुक्ति न पा सकोगे... समर्पण कर दो अपने गुरु के चरण में... वो चाहते थे ज्यादा देर तक टिक सके उनकी विचारधारा... इसलिए डर पैदा कर दिया कि तुम भटक जाओगे बिना गुरु के... ये डर जायज लगा एक बंधे हुए मनुष्य को... उसकी मजबूरी बन गयी गुरु के प्रति समर्पण... कभी स्वेच्छा से नहीं किया उसने समर्पण... एक डर था... नहीं मानी गुरु कि बात तो गुरु नाराज हो जायेंगे... फिर न इधर का रहूँगा न उधर का... वास्तविकता से ज्यादा कल्पना अच्छी लगी... लगती भी... क्यूंकि वास्तविकता है सिद्धांतों से भरी... तर्क से भरी... सत्य से परिपूर्ण... उसे जानने के लिए चाहिए एक जांबाज़ दिल... लेकिन वो नहीं है... क्यूंकि मनुष्य पहले ही कमज़ोर बना चुका है खुद को... बस फंसता चला गया औरों कि परिकल्पनाओं में... यही होता रहा है... और होता रहेगा... तब तक... जब तक... खुद नहीं पढता मनोविज्ञान... और नहीं जानता उसका सदुपयोग... आज तक जो चला है... वह रहा है दुरूपयोग... दूसरे की इच्छा को जानकर उस पर राज करना... यही करता रहा है मनुष्य आज तक... लेकिन कभी अपनी इच्छा को न जान पाया... दूसरों को स्वप्न दिखाने वाला... खुद भी जीता रहा एक स्वप्न में... यह कोई नहीं जान पाया... और वो स्वप्न था... स्वयं को सर्वोच्च साबित करने का... उसका अहं कभी न स्वीकार कर सका ये बात... दूसरों की कुंठित भावनाओं पर राज करने वाला... कभी अपनी ही कुंठा पर विजय न पा सका... इतना लिखने के बाद भी मैं सोचती हूँ... मेरी खोज के बारे में... क्यूँ है मन विचलित... पर यह विचलन अब अच्छी लगने लगी है... रोज नया विषय लाती है... नयी संवेदनाएँ.... नया स्वप्न... और... नयी मुक्ति....!! शायद जान जाऊं क्या है ये.... "मोक्ष''...!!

Divya Jyoti Arya

MuzaffarNagar,
13th July 2012, 3:45 pm.

My Motivators :

Google+ Followers

Gadget

This content is not yet available over encrypted connections.

See My Reflection via Captured Moments of Life: