Saturday, June 23, 2012

एक तलाश मेरी....!!




मुझे कहते हैं कि मैं suppressed हूँ इसलिए बेपरवाहों कि तरह बोलती हूँ.... अच्छा... आप मुझे बताइए.... ये जो बाकी लोग हैं ये क्यूँ नहीं बोलते..?? चुप..?? नहीं है न कोई जवाब..!! कोई बात नहीं... मैं बता देती हूँ... बहुत बोलने कि आदत जो है..!! reason ये है कि जब आप suppression में व्यस्त थे... मैं अपनी reasoning में व्यस्त थी... और समय रहते इतनी समझ आ गयी कि उसे उपयोग कैसे करना है... ये जो चुप हैं ऐसा नहीं कि ये नहीं बोलेंगे... या फिर इनकी reasoning power कुछ कम है... बिलकुल गलत analysis है आपका... असली बात है कि आधे अभी परिपक्व नहीं हुए और जो आधे परिपक्व हो चुके हैं... वो initiative नहीं लेना चाहते... “तो आपका मतलब है आप ‘परिपक्व’ हो चुकी हैं...” न न.... मैंने ऐसा कब कहा..?? मैंने कहा है कि मुझे इतनी समझ आई है अभी तक बस कि इस suppression को उपयोग कैसे करना है..?? सब रो रहे हैं... हाय... हमें दबा दिया.... हाय... हमें कुचल दिया... मैं सोच रही हूँ... कि क्यूँ दबाया गया..?? क्या वजह रही कि कुचल दिए गए..?? कोई कह रहा है शासक निर्दयी है... कोई कह रहा है शासक मूर्ख है... मैं सोच रही हूँ कहाँ कमी है..?? सब बस कहे जा रहे हैं.... बरगला रहे हैं... क्यूंकि तथ्य नहीं है... अनभिज्ञता है... विज्ञान नहीं पढ़ा... जो पढ़ा है उससे बस chemicals बनाने आ गए... पैसे कमाने आ गए... खाना पीना अच्छा हो जाता है... लेकिन reasoning अच्छी नहीं हुई... यही सोच रही हूँ... क्या कारण रहा है..??


आप ले आते हैं अपना तर्क :: कि suppression रहा है... नहीं... मैं मना करती हूँ... क्यूँ मेरे पास इसके खिलाफ भी तथ्य हैं... suppression में रवीन्द्रनाथ टैगोर भी थे... महात्मा गाँधी भी थे... मदर टेरेसा भी थीं... वो सब उठे... वहीँ से ... जहाँ सब कुचले जा रहे थे.... लेकिन वो उठे और कर्म करते गए... सारी जनता चल दी उनके पीछे... क्यूंकि जो वो कह रहे थे... कर रहे थे... वो जनता भी कहना चाहती थी... वो जनता भी करना चाहती थी... लेकिन करे कौन..?? कोई भी ऐसा महान कदम उठाने से पहले यन्त्र चाहियें... यंत्रों को चलाने की कला चाहिए... बहुत साधन चाहियें... जुटा सकते थे उन्हें...लेकिन जनता के पास 'बहाने' ज्यादा थे... उन महान लोगों के पास 'कारण' ज्यादा थे... कैसे किया उन्होंने ये सब..?? ये मैं सोचती हूँ... उन्होंने कला को पढ़ा... उसके पीछे जो भाव छुपा है उसे समझा... उसे रटा नहीं... उसमें जो रस है उसे सही वक्त पर उपयोग करना सीखा... उन्होंने विज्ञान को पढ़ा... देश की तरक्की के लिए... सशक्तीकरण के लिए.... उन्होंने कानून पढ़ा... गलत के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए... गरीबों को उनकी दुर्दशा से मुक्ति दिलाने के लिए...!! स्वतंत्रता के लिए...!!


अब मैं आपको बताती हूँ... बाकी सब क्या करते रहे... बाकी सबने कला को पढ़ा... रंगीन सिनेमा की दुनिया में नाम कमाने के लिए... या फिर क्यूंकि सबसे आसान था पढ़ना इसे... इसके भावों को रट लिया एक ही रात में और उत्तीर्ण हो गए... कुछ ने तो कला को केवल इसलिए पढ़ा क्यूंकि उन्हें ख़िताब चाहिए था... कलाकार का... विज्ञान पढ़ा... परिभाषाएं रट लीं... कुछ ने प्रयोग रट लिए... सफल हो गए अन्वेषक के रूप में... लेकिन आज तक जीवन के सिद्धांत न समझ पाए... क्यूंकि विज्ञान को समझा ही नहीं... अब कानून भी पढते हैं... तो Judge बनना चाहते हैं... Lawyer बनना चाहते हैं... किसी असहाय के अधिकारों का संरक्षण करने के लिए नहीं... न ही कभी कानून के अनुच्छेदों का असली application समझ पाएं हैं.... न ही उसे कभी उजागर कर पाएं  हैं तर्क के साथ..!! और बस कहे चले जा रहे हैं... अजी हमें तो कुचल दिया... हमें तो लूट लिया... यही होगा... जब कोई defensive system नहीं develop करोगे अच्छा... Democracy के नशे में कूद रहे हैं... अभी तक उसका application नहीं समझा... अभी तक नहीं जान पाए अपने अधिकारों के बारे में... अपनी ही उपयोगिता नहीं पता है.... और कोई बोलता है तो उनके जश्न में बाधा आ जाती है... लेकिन जब उनके अधिकारों का हनन होता है तो... हाय... हम तो कुचले जा रहे हैं... अरे... जब तुम्हें समझना चाहिए था तब तुम रटते रहे.... जब तुम्हें करना चाहिए था कुछ लाभकारी... तो तुम्हारी Rave-party चल रही थी.... अब चिल्ला रहे हैं... और मैं बताती हूँ आपको... ये चिल्लाहट भी थोड़ी देर की ही है... क्यूंकि कोई तथ्य नहीं है... सच्चाई नहीं है... अपनी ही कमी पर खेद का पछतावा है ये.... शांत हो जायेगी थोड़ी देर में... क्यूंकि कुछ और मिल जायेगा दिखावे के लिए... अभी तक orkut था... वो बोर लगने लगा... चिल्लाने लगे... किसी ने दाना फेंक दिया  facebook का... अब खुश हैं... कुछ अब फिर से बोर होने लगे... धीरे धीरे ये लहर उठेगी... खूब शोर मचेगा... फिर शान्ति छा जायेगी... क्यूंकि कोई तथ्य नहीं है... यही परिक्रमा चलती रहेगी.... जीवन... निराशा... चिल्लाहट... नया दाना... थोड़ी सी तृप्ति... फिर बुदबुदाहट... फिर कुछ चिल्लाहट... फिर थोड़ा जोश आया... कुछ करने का... उठे ही थे थोडा साहस करके....अरे... देखा तब तक म्रत्यु ही आ गयी...!!


कुछ न कर पाए... सारी जिंदगी बस कोसते रहे... हमें कुछ न मिला... हम कुचल दिए गए... क्यूंकि... कभी कोशिश ही नहीं की... जीवन के सिद्धांत को जानने की.... कोई हमें खेल दे दे... और हम खेलते रहें... उसी में उलझे रहें... यही बहुत है.... जब निराशा होगी अपनी हार पर तो चिल्ला देंगे... सिद्धांत से डर लगता है... क्यूंकि उसके साथ जुडी है सच्चाई... जो वो सुनना नहीं चाहते... इसलिए चाहे मैं कहूँ... या फिर कोई और... यही कहेंगे... कि... Frustrated है... Suppressed है... इसलिए बोलती है... लेकिन मैं बोलती हूँ... क्यूंकि मुझे सत्य कि खोज है... मैं समझना चाहती हूँ सिद्धांत को... मुझे मत बताओ क्या मुझे पढ़ना चाहिए.... कैसे रहना चाहिए... ऐसा नहीं है कि मैं अपमान करती हूँ तम्हारी बातों का.... नहीं... बस मुझे अब विश्वास नहीं है... किसी कि बातों पर... क्या पता तुम्हारा मार्ग मुझे सत्य कि तरफ ले जा रहा है या फिर फेंक रहा है उसी अन्धकार की ओर... तुम्हें समझ है सिद्धांतों की.... सम्मान है कला के लिए.... जानते हो कि प्रकृति के कानून क्या हैं... मैं सम्मान करुँगी तुम्हारी बातों का... लेकिन मत करो मुझसे तथ्यहीन बात... कि... मुझे कुचला गया इसलिए बोलती हूँ...!! बोलने दो... शायद कोई बात... तुम्हारे भी काम की निकल ही जाए....!! 


-Divya Jyoti Arya,

09/06/2012,

6:00 p.m. New Delhi...

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